महाभारत से जुड़ी है बाणगंगा बनने की कहानी अर्जुन के तीरों से बन गए थे यहाँ कुंड जानिए बाणगंगा की रोचक कहानी - My shivpuri

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Monday, April 27, 2020

महाभारत से जुड़ी है बाणगंगा बनने की कहानी अर्जुन के तीरों से बन गए थे यहाँ कुंड जानिए बाणगंगा की रोचक कहानी



बाबनगंगा

बाबनगंगा
बाणगंगा,शिवपुरी

बाबनगंगा को बाणगंगा के नाम से भी जाना जाता है यह छत्री और भदैया कुंड के निकट ही स्थित है यह देव स्थल कहा जाता। यहाँ पर छोटे बड़े बाबन जल कुंड थे किंतु आजकल कुछ ही देखने को मिलते हैं। एक बड़े कुंड के निकट ही प्रसिद्ध मंदिर है। जान मान्यता है कि गंगा जी का पवित्र जल इन कुंडों में आकर मिल गया है। यहां प्रतिवर्ष मकर संक्रांति पर एक धार्मिक मेला लगता है जिसमे दूर दूर से आकर श्रद्धालु पुण्य लाभ लेते हैं।

बाबनगंगा

बाणगंगा बनने की कहानी महाभारत से जुड़ी हुई है। वैसे तो महाभारत काल की पांडवों के अज्ञातवास से जुड़ी रोचक कहानियाँ मध्यप्रदेश के कई हिस्सों में सुनने को मिलते हैं और कई कथाओं के साथ ऐतिहासिक प्रमाण भी मिलते हैं।
ऐसा ही एक स्थान शिवपुरी का बाणगंगा है। कहा जाता है कि अज्ञातवास के दौरान पांडवों ने शिवपुरी के जंगलों में भी कुछ समय काटा था। एक दिन जब कुंती माता को प्यास लगी तो उन्होनें  बेटे अर्जुन को पानी लाने को कहा। आस पास पानी का कोई स्त्रोत नहीं दिखने पर अर्जुन ने जमीन पर तीर मारा, वहाँ से पानी की धारा बह निकली और इस पानी से कुंती ने प्यास बुझाई। यह जगह पांडवों को इतनी पसंद आई कि वह यहां रुके और यहां 52 कुंडो का निर्माण भी कराया। इसलिए यहाँ का नाम बाणगंगा रखा गया। शिवपुरी आने बाले पर्यटक इसे देखने के लिए लायलित रहते हैं। बाणगंगा से लेकर सिध्देश्वर इलाके तक कुल 52 कुंड थे। इन्हें पत्थरों से बनाया गया था। सभी 10 से 15 फ़ीट गहरे थे इनमे बारिश का पानी सहेजा जा सकता था। बाणगंगा पर भीम, नकुल, सहदेव सहित सास-बहु के नाम से कुंड हैं। भीम कुंड सबसे बड़ा है सास बहु कुंड गहरा और संकरा है।

बाबनगंगा

बाणगंगा में अंदर के कुंड के ऊपर राधा-कृष्ण और राम- जानकी की प्रतिमायें स्थापित हैं और यहाँ मंदिर बना हुआ है। मंदिर के चारों ओर अन्य मंदिर हैं। इन मंदिरों में शिवलिंग और हनुमानजी की मूर्ति स्थापित होने से पूरे क्षेत्र का अपना एक धार्मिक महत्व भी हो गया है।

कुंडों के समीप ही एक बड़े पत्थर पर एक शिलालेख भी है। इतिहासकार बताते हैं कि बाणगंगा के कुंड महाभारतीय इतिहास को अपने आप मे समेटे हुए हैं। शिलालेख ब्राह्मी लिपि में है। इसे पढ़ा नही जा सका है लेकिन इससे यह पुष्टि होती है कि यह स्थान महाभारत काल या उससे भी पहले का है।
बाणगंगा इलाके में पुरलीला पत्थर है यह पत्थर बारिश के पानी को सहेज लेता है यह कुंड सदियों से यहां बने हुए हैं। इसलिए उनमें पानी रहता है और बहाँ  के पत्थरों में भी अपनी रहता है इसलिए ये हर मौसम में पानी से लबालब रहते हैं। साल के 12 महीनों में इन कुंडों से पानी मिलता है।

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