जानिए नरवर के इतिहास एवं नरवर के किले के बारे में। - My shivpuri

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Saturday, May 30, 2020

जानिए नरवर के इतिहास एवं नरवर के किले के बारे में।


नरवर
Narwar Map

प्रागैतिहासिक काल के राजा नल द्वारा बसाई गई नगरी नलपुर ( वर्तमान नरवर ) के खंडहर जिले में महाभारत काल से पहले विकसित हो चुकी सभ्यता संस्कृति के चिन्ह है।

Narwar history and narwar fort


महाभारत काल में नरवर का नाम ही नलपुर था और यह निषध राज की राजधानी थी। निषद राजा नल एक कुशल प्रजापालक तथा निपुण योद्धा था। राजा नल के पिता का नाम राजा वीरसेन था। नल का विवाह विदर्भ के राजा भीमरथ की सुंदर कन्या दमयंती से हुआ था। विवाह के कुछ समय बाद राजा नल अपना पूरा राजपाट, ध्रूतक्रीड़ा में अपने चचेरे भाई पुष्कर को हार गये और दमयंती के साथ निषध छोड़कर जंगल मे चले गये जहां नल और दमयंती का भी विछोह हो गया। दमयंती वन में भटकती हुई चेदि राज वर्तमान चंदेरी पहुंची जहां की रानी उसकी मौसी थी।

घटना चक्र घूमता रहा अंत में राजा नल का दमयंती से पुनर्मिलन हुआ और उन्हें अपना खोया हुआ राजपाट भी मिल गया।
महाभारत पर्व 66 अध्याय में वर्णित यह श्लोक भी यह प्रमाणित करता है कि राजा नल ही वर्तमान नरवर के शासक थे।

मां चेदिच्छसि जीयन्ती मातः सत्य ब्रयीमि।
नलस्य नर्सिरस्य, यतरयानभने पुनः।।

Narwar history and marwar fort
Narwar Fort

"खांडेराव रासो" नामक पांडुलिपि में नरवर दुर्ग की स्थापना कछवाहा वंश के राजा नल द्वारा विक्रम संवत आठ में होना बताई गई है। एक अन्य महत्वपूर्ण पांडुलिपि "ढोलामारू रा दहा" में भी नरवर दुर्ग के महत्व और इसके इतिहास की झलक मिलती है। ढोला मारू की कथा इस क्षेत्र में बहुत प्रचलित है।
नरवर दुर्ग पर अपना अधिकार जमाने के लिए अनेक राजाओं में महत्वपूर्ण लड़ाइयां लड़ी।

पाँच किलोमीटर की परिधि में फैले इस ऐतिहासिक दुर्ग के दो दरवाजे है। तथा किले का सम्पूर्ण अहाता चार मुख्य भागों में विभक्त है। जो मज़लोंका, मादर अहाता, गूजर अहाता तथा भोला अहाता के नाम से जाने जाते हैं। दुर्ग में एक सफेद हवेली भी है जो कलात्मक दृष्टि से काफी सुंदर है।

कुछ चढ़ाई के उपरांत पीरन पौर नामक दरवाजा मिलता है इसे सैयदों का दरवाजा भी कहते हैं दो अन्य दरवाजों के नाम क्रमशः गणेश पौर तथा हवा पौर है।

पश्चिम द्वार से जाने पर चार दरवाजे मिलते हैं जिनके नाम क्रमशः उरवाई दरवाजा, गौमुख दरवाजा, बांस दरवाजा है गौमुख दरवाजे के समीप ही गौमुख नामक स्त्रोत है।

दुर्ग में स्थित भग्नावशेषों से स्पष्ट परिलक्षित होता है कि यहां अनेक भव्य मंदिर थे। किन्तु मुस्लिम शासकों ने सब तहस नहस कर दिये।
पूर्वी किनारे पर स्थित प्राचीन कचहरी महल को डाक बंगले के रूप में परिवर्तित कर दिया गया है। यहां एक बड़े हाल में राजा नल का पुराना सिंहासन सुरक्षित है।

इस कचहरी महल के करीब ही लदाऊ बंगला नाम का दालान है। अपने वैभव काल में दीवाने आम के रूप में जाना जाता था। लदाऊ बंगले के पास है छिप महल यह जलाशय 6 दलों के अंडाकार फूल के रूप में एक बड़ी शिला को काटकर बनाया गया है।

दुर्ग में बहुत से मानव निर्मित ताल हैं जिनमें छत्र ताल, चंदन ताल, गौमुख कुंड, संभू ताल, कटोरा ताल, मकर ध्वज ताल प्रसिद्ध है। इनमें मकर ध्वज ताल सबसे बड़ा है। यह लगभग 310 वर्ग फ़ीट क्षेत्र में फैला है तथा इसकी गहराई लगभग 30 फ़ीट है।

तालाबों के अलावा यहां पीने के शुद्ध पानी के लिए कुओं तथा वावड़ियों का निर्माण भी देखने को मिलता है।
पसर देवी की प्रतिमा भी यहां के आकर्षण का एक केंद्र है। लगभग 5 फ़ीट लंबे भैंसे पर 15 फ़ीट लंबी पसर देवी की प्रतिमा यहां लेटी हुई अवस्था मे है। ऐसी मान्यता है कि देवी राजा नल की आराध्य थी।

नरवर की प्राचीन इमारतों में खांडेराव की हवेली का भी विशेष महत्व है। खांडेराव नरवर राज्य के प्रसिद्ध सेनापति थे। इनके द्वारा सन 1748 के आसापास के बर्षों में लड़ी गईं लड़ाइयों का विवरण कवि जतुनाथ कृत पांडुलिपि " खांडेराव रासो" में मिलता है। इस अप्रकाशित काव्य की उक्त पांडुलिपी खांडेराव के वंशज श्री रामसिंह जी वशिष्ठ शिवपुरी के पास उपलब्ध हैं।

नरवर दुर्ग की सामने वाली पहाड़ी पर पूर्व की दिशा में दो मकबरे नुमा भवन दूर से दृष्टिगोचर होते हैं। कहा जाता है कि दिल्ली के फारुख सियर के दो सेनापतियों की ये कब्र ग़ाहें हैं।इन दोनों कब्र गाहों के मध्य एक छोटा सा शिवमंदिर भी है जो हिन्दू मुस्लिम एकता का उत्कृष्ट उदाहरण है।

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